राजा ययाति की कहानी - काम वासना भोग भोगने से शांत नहीं होती
असुरों के राजा बृहस्पर्वा की पुत्री का नाम शर्मिष्ठा था, और असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री का नाम देवयानी था। शर्मिष्ठा और देवयानी के बीच मित्रता थी । एक दिन शर्मिष्ठा बाकी राजकुमारियों के साथ वन विहार के लिए जा रही थी ं । जाते समय उन्होंने गुरु पुत्री देवयानी को भी अपने साथ ले लिया। हजारों सखियां उपवन में टहल रही थी। बहां सुंदर पुष्पों से लदे हुए अनेकों वृक्ष ,कमल से खिले सरोवर,और भौंरों की गूंज सुनाई दे रही थी। यह बड़ा ही मनोरम दृश्य था। सभी राजकुमारियां सरोवर में खेल रही थीं और स्नान कर रही थीं। वे सभी निर्वस्त्र थीं। इस समय भगवान शंकर और पार्वती जी वहां से निकाल रहे थे। उन्हें देखकर सभी कन्याएं सकुचा गई और दौड़ कर अपने-अपने वस्त्र पहनने लगी। शीघ्रता के कारण देवयानी के हाथ में शर्मिष्ठा का वस्त्र आ गया, और उन्होंने वही पहन लिया। यह देख कर राजकुमारी शर्मिष्ठा ने क्रोधित होकर कहा, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? हमारे पुरोहित की कन्या होकर तुमने राजकुमारी का वस्त्र कैसे धरण कर लिया? इस बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हो गया ।
शर्मिष्ठा और देवयानी के बीच विवाद
देवयानी ने उत्तर दिया, तू ज्यादा बढ़कर मत बोल। क्या तू मेरे पिता शुक्राचार्य जी को जानती है? वे तुम्हारे पिता के गुरु हैं और तपोबल से सृष्टि का संचालन कर सकते हैं वे परम पुरुष परमात्मा के समान हैं और निरंतर परमात्मा की स्तुति में रहते हैं । बड़े-बड़े लोकपाल जिनकी वदना करते हैं, हम उन तपस्वी की पुत्री हैं। तेरे पिता हमारे शिष्य हैं, और तू हमारे पुत्री है। देवयानी की इन बातों को सुनकर शर्मिष्ठा क्रोध से तिलमिला उठी और तीखे बचन बोलने लगी। शर्मिष्ठा ने अपनी राजकुमारियों को आदेश दिया इस गुरु की पुत्री को उठाकर कुएं में फेंक दो। राजकुमारियों ने शर्मिष्ठा का आदेश मानते हुए देवयानी को कुए में फेंक दिया और सब वहां से चली गईं।
महाराज ययाति और देवयानी का प्रथम मिलन
महाराज ययाति एक चक्रवर्ती सम्राट थे। वे राजा नहुष के छह पुत्रों में से एक थे। एक दिन वे जंगल में शिकार करने गए। प्यास लगे पर वे एक कुएं के पास पहुंचे। उनके सेवकों ने बताया कि कुएं में कोई है। महाराज ययाति ने एक वस्त्र नीचे फेंक कर और हाथ देकर उसे व्यक्ति को बाहर निकाल। बाहर आने पर उन्होंने देखा कि वह और कोई नहीं बल्कि निर्वस्त्र देवयानी थी देवयानी बेहद संकोच में थीं। यतिन कहा, देवी मैंने केवल आपको बचाने के भाव से यह किया है। इस पर देवयानी ने उत्तर दिया आज तक मेरा हाथ किसी ने नहीं पड़ा। आप यह सुनकर चौक जाएंगे कि मैं कौन हूं। मैं भगवान शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी हूं। यह सुनकर महाराज ययाति के होश उड़ गए। उन्होंने सोचा की इतने बड़े ब्रह्मण ऋषि की पुत्री को निर्वस्त्र अवस्था में स्पर्श करने के करण उन्हें श्राप मिल जाएगा। ययाति ने कहा देवी मैंने केवल आपको बचाने के उद्देश्य से स्पर्श किया। देवयानी ने उत्तर दिया, डरो मत। मुझे पहले ही एक श्राप मिला है कि कोई ब्राह्मण ऋषि मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। केवल एक क्षत्रिय राजकुमार ही मुझे अपनाएगा। यह मुझे भली भांति ज्ञात है। इसलिए मैं तुम्हें पति रूप में वरण करती हूं। ययाति को यह शास्त्र प्रतिकूल संबंध स्वीकार नहीं था, लेकिन जब उन्होंने देखा कि स्वयं देवयानी यह कह रही है और उन्हें ऐसा श्राम मिला है, तो उनके मन ने देवयानी को स्वीकार कर लिया। साथ ही देव सुंदरी देवयानी का सौंदर्य देखकर भी उनका हृदय पिघल गया। ययाति ने कहा यदि भगवान शुक्राचार्य जी इस संबंध के लिए सहमत हों तो मुझे भी यह स्वीकार हैं। ययाति देवयानी को वहीं छोड़कर चले गए और मन में निश्चय किया कि जब भगवान शुक्राचार्य स्वयं देवयानी को लेकर आएंगे तभी वे उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे।
शुक्राचार्य का क्रोध
देवयानी रोती हई भगवान शुक्राचार्य जी के पास पहुंची और उन्हें सारी घटना सुनाई --कैसे शर्मिष्ठा ने राजकुमारियों से कहकर उसे हुए में फेंकना दिया था। देवयानी की बात सनकर शुक्राचार्य जी क्रोधित हो गए और बोले , इसलिए लड़की ने मुझे साधारण पुरोहित समझ लिया है। क्या वह नहीं जानती कि मैं अपनी इच्छा से नया संसार भी रच सकता हूं? शुक्राचार्य जी ने देवयानी को साथ लिया और कहा चलो, ऐसे राजा के राज्य में अब नहीं रहना।
देवयानी का विवाह और शर्मिष्ठा का दासी बनना
जब वृषपर्वा को यह बात पता चली की अगर भगवान शुक्राचार्य जी नाराज हो गए, तो उनके राज्य का विनाश निश्चित है वह तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा। शुक्राचार्य जी ने कहा मैं अपनी पुत्री का अपमान सहन नहीं कर सकता। यदि तुम चाहते हो कि मैं यहां रुकूं तो वही करो जिसमें मेरी पुत्री संतुष्ट हो। वृषपर्वा ने विनम्रता से कहा महाराज आपकी आज्ञा का पालन होगा। कृपया बताएं आपकी पुत्री क्या चाहती है? देवयानी ने कहा मैं जिसे पति रूप में वरण करूं उसकी दासी बनकर शर्मिष्ठा आजीवन मेरी सेवा करें। यह सुनकर वृषपर्वा ने शर्मिष्ठा से कहा पुत्री यदि तुम यह शर्त नहीं मानेगी तो पूरा राज्य संकट में पड़ जाएगा। अपने परिवार और राज्य को संकट से बचाने के लिए शर्मिष्ठा ने देवयानी की बात मान ली और दासी बनने के लिए तैयार ह गई।
इसके बाद शुक्राचार्य जी ने बड़े उत्साह के साथ देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया और शर्मिष्ठा को दासी के रूप में राजा के महल में भेजा गया। विवाह के समय देवयानी ने राजा ययाति से स्पष्ट रूप से कहा एक बात ध्यान रखना यह दासी (शर्मिष्ठा)कभी तुम्हारे करीब नहीं आनी चाहिए शर्मिष्ठा जो एक राजकुमारी थी और अत्यंत सुंदर भी को लेकर देवयानी के मन मे आशंका बनी रहती थी। राजा ययाति भी देवयानी से भयभीत रहते थे ,क्योंकि वह शुक्राचार्य जी की पुत्री थी
शर्मिष्ठा और ययाति के तीन पत्र
समयबीतता गया। एक दिन, जब देवयानी पुत्रवती हो चुकी थी। शर्मिष्ठा ने राजा ययाति को अकेले में आलिंगन के लिए आकर्षित कर लिया। अपनी चतुराई और प्रवीणता से शर्मिष्ठा ने राजा ययाति को अपने वश में लिया । यह सब इतने गुप्त रूप से हुआ कि देवयानी को इसका पता ही नहीं चला कुछ समय बाद देवयानी को दो पुत्र हुए ।जबकि शर्मिष्ठा से राजा ययाति को तीन पुत्र हुए। एक दिन देवयानी वन में घूम रही थी । उन्होंने देखा कि वहां तीन राजकुमार राजचिन्हों से युक्त खेल रहे थे। यह देखकर देवयानी को आश्चर्य हुआ।उन्होंने सोचा चक्रवर्ती सम्राट राजा ययाति के तो केवल दो पुत्र हैं। यह राजकुमार जैसे प्रतीक धरण किया हुए बालक कौन हैं।? देवयानी उनके पास गई और पूछा तुम्हारे पिता कौन है बलकों ने उत्तर दिया ,हमारे पिता महाराज चक्रवर्ती सम्राट ययाति हैं। देवयानी ने फिर पूछा तुम किसके पुत्र हो? बालकों ने कहा हम शर्मिष्ठा माता के पुत्र हैं। यह सुनते ही देवयानी को क्रोध आ गया वह गुस्से से भर कर घर छोड़कर सीधे अपने पिता शुक्राचार्य जी के पास चली गईं। महाराज ययाति उसके पीछे-पीछे गए और माफी मांगने की कोशिश करते रहे पर देवयानी ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।
देवयानी का क्रोध और ययाति का बुढ़ापा
जब देवयानी शुक्राचार्य जी के पास पहुंची, तो उन्होंने पूछा, क्या हुआ बेटी? देवयानी क्रोध में कहा, इस स्त्री लंपट ने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया। किसने दासी (शर्मिष्ठा)के गर्भ से तीन पुत्र उत्पन्न किए। पिताजी दंड दीजिए! शुक्राचार्य जी ने देवयानी से पूछा इन्हें क्या दंड दिया जाए देवयानी ने क्रोध में कहा इसके शरीर में बुढ़ापाआ जाए और यह स्त्री सहवास योग्य न रहें। देवयानी की बात सुनकर शुक्राचार्य जी ने अपने तपोवल से महाराज ययाति को तुरंत बुढा कर दिया। ययाति का शरीर वृद्धि हो गया और उनकी सारी शक्ति क्षीण हो गईं। ययाति ने व्यथित होकर दवयानी से कहा अब तो तुम खुश हो? लेकिन तुमने यह नहीं सोचा कि तुमने अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार ली है। इसके बाद ययाति ने देवयानी से प्रार्थना करते हुए कहा मैं आज तक विषय भोग करते-करते भी तृप्ति नहीं हुआ । बिना तृप्ति के वैराग्य नहीं होता। कृपा करके मेरा बुढापा वापस ले लो ताकि मैं जीवन का आनंद लेकर संतोष प्राप्त कर सकूं।
ययाति की बात सुनकर देवयानी का गुस्सा कुछ शांत हो गया उन्होंने अपने पिता शुक्राचार्य जी से प्रार्थना की, पिता जी ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे इनका बुढ़ापा समाप्त हो जाए और यह फिर से जवान हो सकें। शुक्राचार्य जी ने कहा, अगर इनका कोई पुत्र इन्हें अपनी जवानी देने के लिए तैयार हो जाए तो यह वापस युवा होकर गृहस्थ धर्म का पालन कर सकते हैं।
ययाति के पुत्र पुरुष का बलिदान
ययाति ने अपने पुत्रों से उन्हें अपनी जवानी देने की प्रार्थना की, परंतु उनके चार पुत्रों ने मना कर दिया। अंत में उनके सबसे छोटे पुत्र पूरु इस त्याग के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपने पिता को अपनी जवानी दान कर दी और स्वयं बुढ़ापा और इंद्रिय शक्ति हीनता को स्वीकार कर लिया। महाराज ययाति, पूरु के इस त्याग से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा तुम्हारा यह बलिदान अमूल्य है मैं इसका ऋणी रहूंगा । इसके बाद ययाति ने पूर्व पूरु के यौवन का उपयोग करते हुए 1000 वर्षों तक भोग-विलास किया।
भोगों में सुख नहीं है!
इतने लंबे समय तक भोग विलास में लीन रहने के बावजूद उनकी तृष्णा शांत नहीं हुई भोगों के प्रति उनकी लालसा बनी रही अंततः महाराज ययाति ने इन सबसे उबकर उन्हें त्यागने का निर्णय लिया। उन्होंने विचार किया मैं कितना पतित हो गया हूं कि अपने ही पुत्र की जवानी का उपभोग कर रहा हूं, फिर भी संतोष नहीं मिल रहा ! अब बस और नहीं!
उन्होंने देवयानी से कहा क्या इस पृथ्वी पर मेरे जैसा कोई और विषयों का दास होगा मैं पुरी तरह इंद्रियों का गुलाम बन चुका हूं। परमार्थ की भावना मुझसे कोशो दूर हो गई है केवल विषय सेवन ही शेष रह गया है। यहां तक कि मैंने अपने पुत्र की जवानी तक भोग ली फिर भी कभी तृप्ति का अनुभव नहीं हआ। अब और नहीं!
विषयों का सेवन करते-करते मैंने अपने पुत्र की 1000 वर्ष की आयु भोग ली फिर भी वही तृष्णा वही भोग लालसा बनी रही इस वासना और भोगो का कोई अंत नहीं आज मैं परमात्मा को साक्षी मानकर दृढ़ निश्चय करता हूं कि अब इन भोगों को कभी स्वीकार नहीं करूंगा ।
ययाति कार त्याग और समर्पण
ययाति ने अपने पुत्र पुरु को उसकी जवानी लौटते हुए स्वयं बुढ़ापा स्वीकार कर लिया। उन्होंने निश्चिंत होकर भगवान के चिंतन मैं स्वयं को समर्पित कर दिया। अपने पुत्र पूरु को सिंहासन सौंप कर उन्होंने राजपाट त्याग दिया और वनवास का मार्ग अपनाया। वन में रहते हुए उन्होंने समस्त सांसारिक शक्तियों और इच्छाओं का त्याग किया। अंततः आत्म साक्षात्कार के द्वारा अपने शरीर को तपस्या से भस्म कर वे परमात्मा वासुदेव की परम गति को प्राप्त हुए।
इस कहानी से हमारे लिए सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है स्त्री-पुरुष के बीच का मोह और आसक्ति हमें आत्मबोध से दूर रखते हैं यह जीवन कोई आसन खेल नहीं है माया और मोह का त्याग करना बहुत कठिन है। हम अपने स्वजन और संबंधियों के साथ जो आकर्षण महसूस करते हैं वह माया का जाल है। और इससे मुक्त होना बहुत मुश्किल होता है केवल वही व्यक्ति इसे मुक्त हो सकता है जिस पर श्री कृष्ण की कृपा होती है, यह अनुभव करता है कि भोगों मैं सुख नहीं है संसार के संबंध मिथ्या है।और जब वह अपने चरित्र को निरंतर परमात्मा में लगता है तब भगवान वासुदेव की कृपा से उसे मुक्ति प्राप्त होती है। जो इंद्रियों को छूट देता है वह चाहे कितना ही बड़ा विद्वान या बलवान हो वह अवश्य नष्ट हो जाता है । यही बात जिसके जीवन में आ गई उसका काम बन गया।








